डाइबिटीज (diabetes) का इलाज क्या है ? 2023

डाइबिटीज (diabetes) का इलाज

डाइबिटीज (diabetes) का इलाज क्या है ? आइये आज हम जानते है के डाइबिटीज होने के कारण , लक्षण और इलाज के बारे मे जानेगे । दुनिया भर में लगभग 422 मिलियन लोगों को डाइबिटीज है मतलब sugar है , जिनमें से अधिकांश निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं, और हर साल 15 लाख मौतें सीधे तौर पर डाइबिटीज के कारण होती हैं। पिछले कुछ दशकों में डाइबिटीज के मामलों की संख्या और व्यापकता दोनों ही लगातार बढ़ रही हैं।

डाइबिटीज के लक्षण:

हम ज्ञान-विज्ञान में विश्व गुरु भले ही न हों लेकिन डाइबिटीज में जरूर विश्व में नम्बर वन हैं।
इसके लक्षणों की बात करें तो इससे आपको बार-बार प्यास लगना,अधिक भूख लगना,अचानक वजन का बढ़ जाना या घट जाना,थकान और कमजोरी महसूस होना,घाव का जल्दी ना भरना,आंखों की दृष्टि धुंधली होना,हाथ पैर में झुनझुनी या सुन्न हो जाना,पैरों व घुटनों में दर्द एवं मापने पर शरीर में शर्करा की मात्रा 147mg/dl से अधिक पाई जाए तो यह मधुमेह होने की ओर इशारा करता है।

कारण क्या है ? डायबिटीज होने का

डायबिटीज होने का कारण क्या है इसपे डाँक्टर्स का कहना भी आम तौर पर यही होता है कि डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है । जो एक बार लग जाने के बाद ज़िंदगी भर साथ रहती है । इसके लिए हेल्थ एक्सपर्ट्स हमेशा डायबिटीज के मरीजों को मीठी चीजों से दूर रहने की सलाह देते हैं। यह बीमारी रक्त में शर्करा स्तर बढ़ने से होती है और फिर बढ़ते शुगर को कंट्रोल करना आसान नहीं होता है ऐसा कहा जाता है परन्तु ऐसा नहीं है । लेकिन डायबिटीज मीठा खाने से नहीं होता है (जैसी आम धारणा है), यह तब होता है जब आपका लिवर खाया गया मीठा पचा नहीं पाता है।

और लिवर उसे तब पचाता है जब आप प्रसन्न होते हैं। जब आप आनंदित होते हैं, खुश होते हैं तो आपका शरीर एक रसायन पैदा करता है ‘इंसुलिन’, वह मीठे को पचाता है। लेकिन जब क्रोध में, तनाव में, कामवेग में या अन्य परेशानी में या कहीं ध्यान बंटा हो जैसे टीवी या मोबाइल देखते हुए जब हम भोजन करते हैं, ऐसी परिस्थिति में इंसुलिन पैदा नहीं होता, जिस कारण डायबिटीज यानी शुगर का रोग हो जाता है।

आयुर्वेद se डाइबिटीज (diabetes) का इलाज

डाइबिटीज (diabetes) का इलाज आयुर्वेद के ऋषि कहते हैं कि अगर डायबिटीज को जड़ से खत्म करना है तो आप प्रकृति को अपनाइये

नीम की कड़वी पत्तियां डायबिटीज में रामबाण हैं…प्रतिदिन सुबह-सुबह करेले का जूस पीएं या करेले की सब्जी एवं अदरक खाए साथ ही एक्सरसाइज करें तो आप डायबिटीज की बीमारी से बच सकते हैइसके साथ ही आप प्रतिदिन बीस कोस पैदल चलो। आजकल के लोगो को यह पढ़ते ही झटका लग सकता है । लेकिन सात्विक भोजन और दूध-घी खाए हमारे पूर्वज अंधेरे चलते थे सुबह और शाम तक यह टारगेट पूरा कर लेते थे आराम से। चूंकि निरुद्देश्य यह सब करना बोरिंग व उबाऊ है, इसलिए हमारे प्रबुद्ध पुरखों ने हिमालय के दुर्गम स्थानों में तीर्थ खोजे, मठ बनाए, धाम बनाए, देवस्थल ढूंढे, केदारनाथ, बद्रीनाथ, कावड़, मानसरोवर, अमरनाथ, वैष्णोदेवी, कैलाश, यह सब किसलिए ?

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एक तीर से दो निशाने, पहला सुख-निरोगी काया, दूसरा ये कि तीर्थ ‘तीर्थ’ रहें, सिर्फ जरूरतमंद, श्रद्धालुजन, भक्तजन या असाध्य रोगों से पीड़ित जन ही वहां पहुंचे, धर्म ‘धर्म’ की तरह संचालित हो, धंधे की तरह नहीं, ‘तीर्थ’ टूरिस्ट स्पॉट या सेल्फी प्वाइंट बनकर न रह जाए।

इसीलिए तीर्थ यात्राओं से लोग स्वस्थ होकर लौटते थे, ऐसी लाखों कथाएं बड़े बूढ़ों से सुनने को मिलती हैं । आयुर्वेद के ऋषि कहते हैं ‘लंघनम परम औषधम’, अर्थात उपवास भी हमारे हर रोग को दूर करने के लिए सबसे कारगर औषधि है। तो इतने लंबे, इतने ऊँचें शिखरों पर चढ़ने उतरने में और थोड़ा बहुत रूखा-सूखा खा लेने से आप नवजीवन प्राप्त करके लौटते थे।

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इसलिए दुर्गम और दूरस्थ तीर्थ हमारे पुरखों की विलक्षण बुद्धिमत्ता की देन है, यह एक जीवंत वरदान है हमारेे पितरों का हमारे लिए।हाँ एक बात और, ऐसी दुर्गम जगहों पर जाने के लिये आज तमाम साधन और सुख-सुविधाएं उपलब्ध हो गयी हैं, गाड़ियॉ, खच्चर, पिट्ठू, पालकी, हेलीकॉप्टर, जगह जगह रेस्टोरेन्ट-होटल और भंडारे भी हमको वे कठिन नियम नहीं पालने देते, जो परम आवश्यक हैं। इसलिए भाई, इतने साधनों के बावजूद भी पैदल चलना ही श्रेयस्कर है, दुर्गम स्थलों पर पैदल चलकर जाना ही सर्वाेत्तम है, काहे गधे-खच्चर के प्राण ले रहे हो, उसके मालिक को तो चार पांच हजार रुपये भी मिल जाएंगे, लेकिन गधे को क्या मिलेगा।

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