राजस्थान की महान महासती महारानी पद्मिनी की शौर्य गाथा

महारानी पद्मिनी की शौर्य गाथा

आज हम राजस्थान की महान महासती की शौर्य गाथा के बारे मे जानेगे , जिन्हे महारानी पद्मावती के नाम से भी जाना जाता है, चारित्रिक उज्जवलता, पवित्रता, वीरता, त्याग अपूर्व शौर्य की प्रतीक महारानी पद्मिनी जी और 16 हजार क्षत्राणियों के “जौहर दिवस” पर शत शत नमन उन्हें…

महारानी पद्मिनी की शौर्य गाथा

समय विक्रमी 1360 भाद्रपद की अमावस्या (26 अगस्त 1303) आज ही के दिन को चित्तौड़गढ़ में जौहर व्रत १३०२ इस्वी में मेवाड़ के राजसिंहासन पर “रावल रतन सिंह” आरूढ़ हुए. उनकी रानी थी पद्मिनी जो सिंहल के राजवंश की राजकुमारी थी. गंधर्वसेन व् चम्पावती की पुत्री पद्मिनी जी का विवाह चित्तोड़ के राजा “रतन सिंह” जी से हुआ था । महारानी पद्मिनी का अनिन्द्य सौन्दर्य यायावर गायकों (चारण/भाट/कवियों/योगियों) के गीतों का विषय बन गया था। दिल्ली के तात्कालिक सुल्तान अल्ला-उ-द्दीन खिलज़ी ने पद्मिनी के अप्रतिम सौन्दर्य का वर्णन सुना और उन्हें पाने के लिए आतुर हो गया अल्ला-उ-द्दीन ने चित्तौड़ की ओर कूच किया उसने चित्तौड़गढ़ में अपने दूत को इस संदेश के साथ भेजा कि अगर उसको महारानी पद्मिनी को सौंप दिया जाए तो वह मेवाड़ पर आक्रमण नहीं करेगा।

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वीर राजपूतों के लिए यह सन्देश अपमानजनक था और सभी क्षत्रियों का खून खौला देने के लिए काफी था। रतन सिंह जी ने सभी सरदारों से मंत्रणा की, कैसे सामना किया जाय, खिलजी की सेना बहुत विशाल और शक्तिशाली थी खिलजी चित्तौड़गढ़ को घेरे हुए बैठा था ,
राजपूतों ने अपने लिए सर्वोच्च मानदंड स्वीकार किया था ! कभी पीछे से वार नहीं किया , निहत्थे पीठ दिखाकर भागते शत्रु पर प्रहार नहीं किया शरणागत को क्षमादान दिया, स्त्रियों पर कुदृष्टि नहीं डाली लूटपाट नहीं किया सैदव धर्म युद्ध ही किया।

समस्या का समाधान निकाला गया अल्ला-उ-द्दीन को उत्तर भेजा गया कि वह अकेला गढ़ में प्रवेश कर सकता है, राजपूतों का वचन है कि उसे किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया जायेगा….हां वह केवल महारानी पद्मिनी को देख सकता है…बस. उसके पश्चात् उसे चले जाना होगा चित्तौड़ को छोड़ कर… खिलजी ने स्वीकार किया। निश्चित दिन को अल्ला-उ-द्दीन पूर्व के चढ़ाईदार मार्ग से किले के मुख्य द्वार तक चढ़ा, और उसके बाद पूर्व दिशा में स्थित सूरजपोल तक पहुंचा। रावल रतन सिंह ने महल तक उसकी अगवानी की।

महल के उपरी मंजिल पर स्थित एक कक्ष कि पिछली दीवार पर एक दर्पण लगाया गया, जिसके ठीक सामने एक दूसरे कक्ष की खिड़की खुल रही थी…उस खिड़की के पीछे झील में स्थित एक मंडपनुमा महल था जिसे रानी अपने ग्रीष्म विश्राम के लिए उपयोग करती थी। रानी मंडपनुमा महल में थी जिसका बिम्ब झरोखों से होकर उस दर्पण में पड़ रहा था खिलजी को दर्पण में प्रतिबिंब दिखा दिया गया

महारानी पद्मिनी की शौर्य गाथा
Image credit: Google

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परिस्थितियां असमान्य थी, किन्तु एक राजपूत आतिथ्य की गरिमा को अपनाते हुए, अल्लाउद्दीन को ससम्मान पहुंचाने मुख्य द्वार तक स्वयं रावल रतन सिंह जी गये थे …..अल्लाउद्दीन ने तो पहले से ही धोखे की योजना बना रखी थी। उसके सिपाही द्वार के बाहर छिपे हुए थे… द्वार खुला….रावल जी को जकड़ लिया गया और उन्हें पकड़ कर शत्रु सेना के खेमे में कैद कर दिया गया।
रावल रतन सिंह कैद में थे। अल्लाउद्दीन ने फिर से संदेश भेजा गढ़ में कि राणाजी को वापस गढ़ में सुपुर्द कर दिया जायेगा, अगर महारानी पद्मिनी को उसे सौंप दिया जाय। चतुर रानी ने काकोसा गोरा और बादल से मंत्रणा किया और एक चातुर्यपूर्ण योजना राणाजी को मुक्त करने के लिए तैयार की।

दो महापराक्रमी बलिदानी गोरा व बादल ने सुलतान खिलजी की चालबाजी का उत्तर युक्ति से देने की तैयारी कर ली.
गोरा बादल जो रानी की दर्पण में प्रतिबिंब दिखाए जाने से कुपित होकर चित्तौड़गढ़ से चले गए थे रानी का संदेश पाकर वापस आए।

अल्लाउद्दीन को सन्देश भेजा गया महारानी पद्मिनी तैयार हैं उनके साथ 700 दासियां भी जायेंगी। प्रमुदित अल्लाउद्दीन मान गया ..प्रभात बेला में सात सौ बंद पालकियां खिलज़ी के शिविर के सामने आकर रुकीं, खिलजी अपनी जीत पर इतरा रहा था। उसने सोचा था कि ज्योंही पद्मिनी मिलेगी रावल रतन सिंह का वध कर दिया जायेगा….पालकियों से नहीं उतरी थी रानी पद्मिनी और उनकी दासियां…बल्कि पालकियों से कूद पड़े थे रणबांकुरे राजपूत योद्धा …केसरिया बाना पहन कर.। गोरा और बादल के नेतृत्व में तुर्क सेना ने तुरत अपने सुल्तान को सुरक्षा घेरे में लिया। रतन सिंह जी को सुरक्षा के साथ किले में वापस ले गये। घमासान युद्ध हुआ, बलिदानियों में गोरा और बादल भी थे, जिन्होंने मेवाड़ के भगवा ध्वज की रक्षा के लिए अपनी आहुति दे दी थी।

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खिलजी की सेना चित्तौड़गढ़ को घेरे रही किसी का भी बाहर निकलना सम्भव नहीं था रसद आपूर्ति ठप्प हो गई ..। सुल्तान की सेना वहां अपना पड़ाव डाले बैठी थी, छः महीने बीत गये, किले में संगृहीत रसद ख़त्म होने को आई ,ऐसे में बस एक ही विकल्प बचा था ..युद्ध करना…शत्रु का यथासंभव संहार करते हुए वीरगति को पाना। तब किले में मौजूद लगभग १०००० क्षत्रियों ने अंतिम युद्ध का निर्णय किया

दुर्ग के बीच स्थित मैदान में लकड़ियों, नारियलों एवम् अन्य इंधनों का ढेर लगाया गया…..सारी स्त्रियों ने, रानी से दासी तक, अपने बच्चों के साथ गोमुख कुन्ड में विधिवत पवित्र स्नान किया….सजी हुई चित्ता को घी, तेल और धूप से सींचा गया…. चित्ता से उठती लपटें आकाश को छू रही थी। नारियां अपने श्रेष्ठतम वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित थी, वीरांगनाओं ने अपने पुरुषों को युद्ध भूमि में जाने के लिए कुमकुम तिलक लगा अश्रुपूरित विदाई दिया थी….अंत्येष्टि के शोकगीत गाये जा रही थी. प्रशांत हुई, महिलाओं ने महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में चिता कि ओर प्रस्थान किया….और समा गई धधकती चित्ता में…….जौहर के लिए….देशभक्ति और गौरव के उस महान यज्ञ में समिधा बनकर अपनी पवित्र आहुति देने के लिए।

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जय एकलिंग, हर हर महादेव के उदघोषों से गगन गुंजरित हो उठा था. आत्माओं का परमात्मा से विलय हो रहा था।

अगस्त २५, १३०३ कि भोर थी, आत्मसंयमी दुःख सुख को समान रूप से स्वीकार करनेवाला भाव लिए, पुरुष खड़े थे उस हवन कुन्ड के निकट, कोमलता से भगवद गीता के श्लोकों का कोमल स्वर में पाठ करते हुए…..अपनी अंतिम श्रद्धा अर्पित करते हुए…. प्रतीक्षा में कि वह विशाल अग्नि उपशांत हो। पौ फट गयी…..सूरज कि लालिमा ताम्रवर्ण लिए आकाश में आच्छादित हुई…..पुरुषों ने केसरिया बागे पहन लिए….अपने अपने भाल पर जौहर की पवित्र भभूत से टीका किया….मुंह में प्रत्येक ने तुलसी का पता रखा…. राजपूत साक्षात काल बन गए दुर्ग के द्वार खोल दिए गये। जय एकलिंग….हर हर महादेव कि हुंकार लगते रणबांकुरे मेवाड़ी टूट पड़े शत्रु सेना पर…मरने मारने का उत्साह था…. अंतिम सांस तक अपनी तलवारों को शत्रु का रक्त पिलाया…और स्वयं लड़ते_ लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गये।
70000 तुर्कों को मारकर 10000 बलिदान हो गये , युद्ध अंतिम राजपूत के जीवित रहने तक चला
अल्लाउद्दीन खिलज़ी की जीत उसकी हार थी, एक ऐसा संघातक चोट जिसे वह कभी भूल नहीं पाया ।

written by: Poonam Kaushik

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