जनमाष्टमी कब मनायी जाती है ? कृष्ण कौन हैं,अद्भुत तथ्य

जनमाष्टमी

जनमाष्टमी कब मनायी जाती है ? कृष्ण कौन हैं,अद्भुत तथ्य जनमाष्टमी व्रत का महत्व,जन्माष्टमी व्रत कैसे करें और इसमें क्या खाना चाहिए ?

” कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन मनाई जाती है।।
इस दिन भगवान श्री कृष्ण का 5250 वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा। योगेश्वर कृष्ण के भगवद्गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी को इसके अलावा विदेशों में रहने वाले भारतीय भी इसे पूरी आस्था और खुशी के साथ मनाते हैं।


गोकुल में यह त्योहार ‘गोकुलाष्टमी’ के नाम से मनाया जाता है।भगवान श्रीकृष्ण विष्णुजी के आठवें अवतार माने जाते हैं। यह श्रीविष्णु का सोलह कलाओं से पूर्ण भव्यतम अवतार है।

जन्माष्टमी व्रत कैसे करें और इसमें क्या खाना चाहिए

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन लोग व्रत रखते हैं और रात 12 बजे कान्हा के जन्म के बाद उनकी पूजा करते हैं और व्रत खोलते हैं। इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बाल गोपाल स्वरूप की पूजा की जाती है।सबसे पहले कृष्णजी या लड्डू गोपाल की मूर्ति को गंगा जल से स्नान कराकर दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, केसर के घोल से स्नान कराएं। फिर शुद्ध जल से स्नान कराएं। सुंदर  वस्त्र पहनाएं। रात्रि बारह बजे भोग लगाकर पूजन करें व फिर श्रीकृष्णजी की आरती करें। उसके बाद भक्तजन प्रसाद ग्रहण करें। व्रती दूसरे दिन नवमी में ही व्रत का पारणा करें।

“जनमाष्टमी व्रत का महत्व”

मान्यता है कि इस एक दिन जन्माष्टमी व्रत रखने से कई व्रतों का फल मिल जाता है।भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों की सभी मुरादें पूर्ण करते हैं।श्री कृष्ण जनमाष्टमी का महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शास्त्रों में इस व्रत को ‘व्रतराज’ कहा जाता है।  

“कृष्ण कौन हैं,अद्भुत तथ्य” जनमाष्टमी

कृष्ण की लीला उस लीलाधर को ही शोभती है । कृष्ण चरित उफनती हुई उत्ताल तरंगों वाली बरसाती नदी की भांति है, जो कगारों को ढहाने के साथ ही आस पास का सब कुछ बहा ले जाती है ।
संसार के इतिहास में श्रीकृष्ण जैसा निराला, विलक्षाण, अद्भुत, अद्वितीय विश्वबन्धुत्व, महापुरुष न मिलेगा। यदि किसी महापुरुष में वेद, दर्शन, योग, आध्यात्म, इतिहास साहित्य, संगीत, कला, राजनीति, कूटनीति आदि सभी एकत्र देखने, हैं तो वह अकेले देवपुरुष श्रीकृष्ण हैं सत्य ये है कि दुनिया के नादान लोगों ने उस योगीराज श्रीकृष्ण का भेद नहीं जाना। सत्य-न्याय, धर्म और मानवता की रक्षा के लिए कई प्रकार की भूमिकाएं निभाई। कई बार अपमान, विरोध व संघर्ष का जहर पीना पड़ा। सम्पूर्ण जीवन कष्ट, संघर्ष, विवादों मुसीबतों का घर रहा। ऐसे विरोधाभास में रहते, जीते जीवन में कभी निराश, हताश, उदास एवं दुःखी नजर नहीं आए। यही उनके जीवन की समरसता एवं महापुरुषत्व है।

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घनघोर वर्षा वाली भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अर्धरात्रि, जब पूर्वी क्षितिज पर अर्धचंद्र का उदय हो रहा था, किंतु काले घने बादलों के कारण दृश्यमान नहीं था । उसी प्रकार कारागार में कृष्ण का जन्म हो रहा था, किंतु माता पिता के अलावा किसी को ज्ञात नहीं था । जन्म लेने के बाद ही माता पिता से बिछडना पड़ा ।

वसुदेव की बेड़ियां तथा कारागार के दरवाजे खुल जाते हैं और पहरेदार बेसुध हो जाते हैं । घनघोर बारिश में शेषनाग के फन के छत्र की छाया में उफनती हुई यमुना के जल के कृष्ण का चरण छूकर घट जाने के कारण वसुदेव गोकुल में नन्द के घर में यशोदा के बगल में कृष्ण को लिटा कर बालिका के रूप में जन्मी योगमाया को लेकर सकुशल कारागार में पहुंच जाते हैं । अब कारागार के दरवाजे बंद हो जाते हैं, वसुदेव के पैरों में बेड़ियां पड़ जाती हैं और पहरेदार जाग जाते हैं ।

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शैशवावस्था से ही कृष्ण के द्वारा भयंकर राक्षसों का संहार होने लगता है, जैसे हाथ – पांव हिलाता किलकारी मारता बच्चा खिलौनों को तोड़-फोड़ रहा हो। थोड़ा बड़े होते होते कृष्ण माखन चुराने से लेकर चीर और चित्त चुराने तक की कृष्ण की चोरियों की प्रमुख विशेषता यह है कि जिसका चुरा लिया गया वह धन्य हो गया तथा अन्य सोचते रहे कि हाय मेरा क्यों नहीं चुराया।कालिया नाग के फन पर नाचने से कृष्ण की नृत्य लीला आरंभ होती है जो महारास में पूर्णता प्राप्त करती है ।

वंशी के बिना बालकृष्ण की कल्पना ही असंभव है ।उनकी वंशी की सुमधुर तान न केवल गोपियों को खिंचे चले आने के लिए विवश करती है, सम्पूर्ण प्रकृति उस स्वर लहरी से तरंगायित हो जाती है ।

यद्यपि भागवत में राधा नहीं हैं, किंतु जयदेव गिरा की सम्मोहिनी शक्ति के कारण हम राधा के बिना कृष्ण की कल्पना भी नहीं कर सकते। पहले राधा तब कृष्ण। निकुंज केलियों और महारास की संगिनी राधा कृष्ण के मथुरा गमन के बाद उनसे कभी नहीं मिल पातीं। विरहिणी राधा परब्रह्म की आह्लादिका शक्ति हैं ।

वृन्दावन से जाने पर राधा ही नहीं वंशी भी छूट गई। वंशी, जो कृष्ण के हाथ और अधर से विलग होना ही नहीं जानती थी, जो गोपियों की ईर्ष्या का कारण थी, वृन्दावन छूटने के बाद कृष्ण के हाथ में कभी नहीं दिखाई पड़ी।

“महाभारत और कृष्ण”

महाभारत में कृष्ण की भूमिका विस्तृत विवेचना का विषय है । द्रोपदी के चीर हरण के समय पांडवों की गुहार लगाने से दुशासन तनिक भी विचलित नहीं हुआ क्योंकि हत तेज पांडव सिर झुकाए हुए उसके सामने दासवत बैठे हुए थे। द्रोपदी ने जब कृष्ण को पुकारा तो शायद कृष्ण के आतंक से दुशासन की भुजाएं शिथिल हो गयीं और द्रोपदी की लाज बच गई। ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भ में कृष्ण के द्वारा परीक्षित की रक्षा के कारण ही कुरु वंश विनष्ट होने से बच सका ।

समस्त विश्व के अंनत बंधनों से परे होता है एक कृष्णभक्त का नाता अपने आराध्य मोहन से,.जहाँ प्रेमिका जैसा आकर्षण,माँ जैसा ममत्व और मित्र जैसे सहयोग का आदान प्रदान किया जाता है,और इस बीच मोह,लोभ,ग्लानि और कुत्सा आदि के लिए कोई स्थान नहीं,.इसका प्रतीक होता है केवल “विश्वास”….
समग्र जगत को आनंद देने वाले उन्हीं कर्मयोगी योगीराज श्रीकृष्ण,यशोदानंदन को जन्मोत्सव की बधाइयाँ 🙏🏻

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