रक्षाबंधन 2023: (रक्षा-सूत्र ) का वैदिक महत्व

रक्षाबंधन 2023

रक्षाबंधन 2023: (रक्षा-सूत्र ) का वैदिक महत्व क्या है, रक्षाबंधन 2023 मे कब है और राजस्थान मे रक्षाबंधन कैसे मनाते है, भद्रा (Bhadra) के बारे में जानेगे । लीजिये हर त्यौहार की तरह रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्यौहार को भी मुहूर्त की नजर लग गयी है। यहाँ भी 30 या 31 अगस्त को रक्षाबंधन मनाने का ​संदेह बना हुआ है।

ज्योतिषाचार्यों के कथनानुसार रक्षा-सूत्र (राखी) बांधने का समय :-

  • इस बार 2023 में श्रावण मास शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि 30 अगस्त, बुधवार को सूर्योदय से सुबह 10:59 तक रहेगी, तत्पश्चात पूर्णिमा प्रारंभ होगी जो 31 अगस्त, गुरुवार को सुबह 7:6 बजे तक रहेगी।
  • 30 अगस्त को भद्रा सुबह 10:59 से प्रारंभ होगी जो रात्रि 09/03 तक रहेगी।
  • 31 अगस्त को प्रातः 7 बजे से पूर्व रक्षाबंधन का पर्व मना पाना अधिसंख्य हिन्दुओं के लिये सम्भव नही है। राजकीय अवकाश-सूची में भी 31 अगस्त का अवकाश घोषित है।

राखी (मौली) का महत्व:- रक्षाबंधन 2023

परन्तु प्राचीनकाल से ही राखी के रूप में मौली या कलावा बांधने का प्रचलन रहा है,जो सबसे उत्तम है। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है।इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है….

(रक्षा-सूत्र ) का वैदिक महत्व
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परन्तु मौली बांधकर किए गए संकल्प का उल्लंघन करना अनुचित और संकट में डालने वाला सिद्ध हो सकता है।यदि आपने राखी या मौली बांधी है तो उसकी पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है।

पूरे भारतवर्ष में कला,संस्कृति,भोजन,फैशन और संगीत की समृद्ध विरासत है।यह समृद्ध विरासत उस तरीके को दर्शाती है जिसमें हम रक्षा बंधन मनाते हैं।ऐसी ही एक अनूठी परंपरा सून या शगुन मंदाना की है जो रक्षा बंधन के अवसर पर भाइयों की कलाई पे राखी बांधने से पूर्व होती है।
इससे सर्वप्रथम सभी अपने जीवन में देव और दैवीय शक्तियों का स्वागत करते हैं।रक्षा बंधन भी अनिवार्य रूप से यही है – इन प्रतीकों में स्वास्तिक,सूर्य देवता,भगवान राम,भगवान गणेश और श्रवण कुमार कई अन्य शामिल हैं।

राजस्थान मे रक्षाबंधन 2023

मंदाना एक राजस्थान की लोक कला भी है जिसमें दीवारों पर, घरों के फर्श पर या कागजों पर भी चित्र बनाना शामिल है।वहाँ नगरों में कागजों पर ईश्वर के चित्र बनाते हैं।फिर इन कागजों को घरों की दीवारों और प्रवेश द्वारों पर चिपका दिया जाता है।सून मंदाना की परंपरा आमतौर पर राजस्थान में किसी भी त्योहार,खासकर रक्षा बंधन से पहले की दिनचर्या है। अनुष्ठान किसी भी शुभ घटना से पहले देवताओं और सभी दिव्य शक्तियों का आह्वान करता है।ध्वनि या चित्र कई प्रकार के होते हैं। लोग अपनी आस्था और विश्वास के अनुसार ईश्वर का आवाह्न करते हैं
सून जिमाना की रस्म के दौरान, दीवारों पर उत्कीर्ण स्वरों को रोली,चावल,लाल पवित्र धागा और कुछ पानी के साथ गुड़ या कोई अन्य मिठाई अर्पित की जाती है।जिस प्रकार गणेश जी की स्थापना किसी भी शुभ कार्य,विशेष रूप से शादी से पहले सौभाग्य का आह्वान करने के लिए की जाती है ठीक उसी प्रकार रक्षाबंधन के दिन सून जिमाना भी अनिवार्य है..

राखी के प्रकार:-

राखी पे रामराखी,सामान्य राखी और चूड़ाराखी या लूंबा बाँधने का रिवाज़ है। रामराखी सामान्य राखी से भिन्न होती है। इसमें लाल डोरे पर एक पीले छींटों वाला फुँदना लगा होता है। यह केवल भगवान को ही बाँधी जाती है।सामान्य राखी भाईयों को बांधी जाती है तथा चूड़ा राखी भाभियों की चूड़ियों में बाँधी जाती है।

रक्षाबंधन मुहूर्त और भद्रा (Bhadra) – क्या होता है भद्रा, भद्राकाल में क्या करें क्या ना करे ?

धर्म-अवलम्बी हिन्दू समाज क्या करे… किसके कहने पर, किस दिन त्यौहार मनाये, यह बड़ी दुविधा है। अन्य सभी मतों के अनुयायी अपने धर्मगुरूओं द्वारा बतायी हुई तिथि को सर्वमान्य मानकर अपना त्यौहार मनाते हैं, किन्तु यह हमारे लिये बड़े दुर्भाग्य और ग्लानि की बात है कि एक तरफ जहाँ आज भारतीय ज्योतिष गणना का लोहा नासा भी मानता है, वहीं भारत में रहने वाले तथाकथित ज्योतिषाचार्य ही शुभ मुहूर्त को लेकर आपस में सहमत नही हैं। इस दुविधा के कारण, हिन्दू समाज के मन में अपने पवित्र त्यौहारों के प्रति विरक्तता आना स्वाभाविक है।
मेरा ऐसा मानना है कि रक्षाबन्धन भाई-बहन के बीच अगाध निश्छल प्रेम का त्यौहार है,..”रक्षाबंधन”भाई बहन के रिश्ते का प्रसिद्ध त्योहार,रक्षा का मतलब सुरक्षा और बंधन का मतलब बाध्य है।
जिसे किसी शुभ या अशुभ मुहूर्त की सीमा से बाहर ही रखना चाहिये और अनेको माध्यम से आने वाली भ्रामक सूचनाओं को नजरअंदाज करना चाहियेे।

हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार भद्रा में शुभ कार्यों को निषेध माना गया है….जैसे मुण्डन संस्कार, गृहारंभ,विवाह संस्कार, गृह – प्रवेश, रक्षाबंधन, शुभ यात्रा, नया व्यवसाय आरंभ करना और सभी प्रकार के मंगल कार्य भद्रा में वर्जित माने गये हैं…

भद्रा क्या है:-

एक हिन्दु तिथि में दो करण होते हैं. जब विष्टि नामक करण आता है तब उसे ही भद्रा कहते हैं. माह के एक पक्ष में भद्रा की चार बार पुनरावृति होती है. जैसे शुक्ल पक्ष की अष्टमी व पूर्णिमा तिथि के पूर्वार्द्ध में भद्रा होती है और चतुर्थी व एकादशी तिथि के उत्तरार्ध में भद्रा होती है.
कृष्ण पक्ष में तृतीया व दशमी तिथि का उत्तरार्ध और सप्तमी व चतुर्दशी तिथि के पूर्वार्ध में भद्रा व्याप्त रहती है।

मेरा सभी ज्योतिषाचार्यो और धर्मगुरूओं से भी करबद्ध निवेदन है कि वे एकमत होकर, किसी एक तिथि का चयन करें और समाचार-पत्रों के माध्यम से आम जनता के बीच स्पष्ट तिथि पर त्यौहार मनाने का निर्देश दें, जिसे मानकर, बिना किसी संशय के हिन्दू समाज अपने त्यौहारों को प्रेम और विश्वास के साथ मना सके।

रक्षा-सूत्र(राखी,मौली) बांधने का मंत्र:-
येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।।

रोली तिलक लगाने का मंत्र:-
“सिन्दूरं सौभाग्य वर्धनम, पवित्रम् पाप नाशनम्। आपदं हरते नित्यं, लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा॥

सभी को रक्षाबंधन की बधाई और अंनत शुभकामनाएं
-पूनम कौशिक

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