श्राद्ध और पितृपक्ष

श्राद्ध और पितृपक्ष

श्राद्ध और पितृपक्ष हमारी संस्कृति में या यों कहें कि हिन्दू धर्म में प्रतिवर्ष भाद्रपद, शुक्ल पक्ष पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहते हैं…

शास्त्रों में मनुष्य के लिए कुल 3 ऋण बतलाए गए हैं-

1. देव ऋण, 2. ऋषि ऋण और 3. पितृ ऋण ।

इनमें श्राद्ध द्वारा पितृ ऋण उतारना आवश्यक माना जाता है। हमारे पूर्वज जो मृत्यु के बाद पितृलोक में वास करते हैं, इस पक्ष में धरती पर आकर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं… इसलिए उन जीवित वंशजों का कर्तव्य है कि अपने उन पूर्वजों की तृप्ति या प्रसन्नता के लिए नियम संयम से रहते हुए पिंडदान या जल अर्पित करे. ऐसी मान्यता है कि पितरों की कृपा के बिना हमारा कोई शुभकार्य निर्विघ्न संपन्न नहीं होता. इसीलिए विवाह आदि शुभ संस्कारों में पितृ पूजन का विधान है….श्राद्ध’ का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक किए गए पदार्थ-दान (हविष्यान्न, तिल, कुश, जल के दान) का नाम ही श्राद्ध है। श्राद्ध कर्म पितृऋण चुकाने का सरल व सहज मार्ग है। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितरगण वर्षभर प्रसन्न रहते हैं।

क्या दूसरे धर्म मे भी श्राद्ध और पितृपक्ष को मानते है ?

 इस्लाम या इसाई धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता नगण्य है फिर भी मुसलमान शब्बेबरात के दिन अपने पूर्वजों की कब्रों पर फातिहा पढ़ते हैं और कुछ मिष्ठान्न चढ़ाते हैं. इसाई भी किसी विशेष दिन को अपने पूर्वजों की कब्रों पर मोमबत्ती जलाते और प्रार्थना करते हैं। कबीलाई आदिवासी संस्कृतियों में तो अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के बड़े बड़े आयोजन किये जाते हैं. अर्थात विश्व का हर मानव समुदाय किसी न किसी रूप में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा ज्ञापित करता ही है।

कैसे करते है पितृपक्ष और श्राद्ध क्रिया

अब आते हैं अपने “पितृपक्ष और श्राद्ध क्रिया पर” जिनके पक्ष और विपक्ष में आजकल सोशलमीडिया पर बहुत कुछ कहा जा रहा है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद हमारे यहाँ दाहसंस्कार, घंट में जल अर्पण, क्षौर कर्म और तेरहवीं संस्कार होता है। अलग अलग क्षेत्रों में इसका स्वरूप अलग अलग होता है। आजकल तेरहवीं के दिन किये जाने वाले ब्राह्मण भोज और भ्रातृभोज को मृत्युभोज कहकर उसकी निंदा की जा रही है और इसपर कानूनी प्रतिबंध की बात भी की जा रही है।

एक बात स्पष्ट है कि मृत्यु के बाद किसी का अस्तित्व केवल हमारी स्मृतियों में ही होता है। उससे इतर किसी अस्तित्व की कोई प्रामाणिकता नहीं है, शिवाय किसी के कहे अनुसार विश्वास करने के। गीता में “ध्रुवं जन्म मृतस्य च ” के अनुसार यदि पुनर्जन्म है तो वह तत्काल हो जाता होगा। कबीर के अनुसार यदि “फुटै कुम्भ जल जलहिं समाना” भी सही है तो जीवात्मा का अस्तित्व परमात्मा में विलीन हो गया और उसका कोई अवशेष बचा ही नहीं। फिर यह भी निश्चित नहीं कि यदि पुनर्जन्म होता रहा है तो हमारा कोई भी पूर्वज हमसे पहले कितने लोगों का संबन्धी रहा होगा या उसकी योनि क्या रही होगी ? इस तरह पितृलोक की अवधारणा भी कहाँ तक सही हो सकती है ? फिर ऐसा व्यक्ति जो हमारा पूर्वज रहा है क्या हमारे किसी दान की प्रत्याशा में कहीं बैठा होगा ?

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इन सारे किन्तुओं परन्तुओं के बाद भी मैं खुले मन से अपने मृत पूर्वजों के प्रति किये जाने वाले श्राद्ध , पिंडदान आदि कार्यों का समर्थन करती हूँ क्योंकि ये क्रियायें या संस्कार हमें अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर प्रदान करते हैं. क्या जिस माता पिता की बदौलत हमारा शरीर मिला, जिनके त्याग की ईंटों पर हमारे सफलता का महल खड़ा है, हम उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का कोई एक अवसर नहीं निकाल सकते ? पितृपक्ष जैसा आयोजन हमें यह अवसर प्रदान करता है। हम इस समय जो भी निर्धारित शास्त्रीय विधियाँ करते हैं उनके साथ उनके कार्यों, परिस्थितियों को याद करके प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं और करनी चाहिए। तेरहवीं के भोज में कोई बाध्यता नहीं है और लोग अपने सामर्थ्य के अनुसार खर्च करते हैं। इसमें दिखावा और सामाजिक हैसियत का प्रदर्शन बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है।

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ये सभी आयोजन चाहे मृत्यु के तत्काल बाद किये जाते हैं या पितृपक्ष में, तभी सार्थक होंगे जब हम जीवन काल में अपने माता पिता या किसी पूर्वज का भरपूर परितोष करें। हमारे उपनिषदों में भी कहा गया है कि माता पिता का अपने कार्यों से तोष करने वाले व्यक्ति की सभी क्रियायें सफल होतीं हैं। हमारे समाज में पैसों की भूख के आगे माता पिता की जो दुर्दशा देखने को मिल रही है उसके आगे कोई भी पूजापाठ दिखावा के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

यह निश्चित है कि परिवार में मृत्यु जैसी पीड़ा से मन को विरत करने के लिए ही ये सब क्रियायें नियत की गईं हैं और जन सामान्य लोगों को इनकी ओर श्रद्धावान बनाये रखने के लिए ही पितृलोक या विभिन्न दान ग्रहण करने की परिकल्पना बनायी गयी।
मेरी स्पष्ट मान्यता है कि जीते जी माता पिता की भरपूर सेवा करें, उन्हें प्रसन्न रखने का हर यत्न करें तभी मृत्यु के बाद उनके लिए किया जाने वाला आपका कोई भी धार्मिक कृत्य आपके लिए फलदायी होग। ” श्रद्धया दीयते इति श्राद्ध: ” अर्थात सबसे महत्वपूर्ण आपकी श्रद्धा है दिखावा अर्थहीन है।

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श्राद्ध/पितृ पक्ष के दौरान पितरों के लिए मुक्ति तर्पण और पिंडदान किया जाता है। तर्पण यानी जल देना और पिंडदान यानी भोजन देना। जिस प्रकार पशुओं का भोजन तृण और मनुष्यों का भोजन अन्न कहलाता है उसी प्रकार देवता एवं पितरों का भोजन अन्न का सार तत्व है। सार तत्व अर्थात गंध,रस और ऊष्मा।
पितरों के लिए किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध तथा तंडुल अर्थात तिल के साथ जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं।
पितरों को जल देने के लिए कुशा(घास) और तिल का अत्यधिक महत्व है। कुशा भगवान विष्णु का प्रतीक है और तिल में भगवान विष्णु का वास होता है। पितरों को जल देते समय अपने गौत्र का नाम लें और कहें की वसु रूप में मेरे पितृ जल ग्रहण करके तृप्त हों।

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